मंच पर सक्रिय योगदान न करने वाले सदस्यो की सदस्यता समाप्त कर दी गयी है, यदि कोई मंच पर सदस्यता के लिए दोबारा आवेदन करता है तो उनकी सदस्यता पर तभी विचार किया जाएगा जब वे मंच पर सक्रियता बनाए रखेंगे ...... धन्यवाद   -  रामलाल ब्लॉग व्यस्थापक

हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

तबीब कसाई हो गए? (व्यंग गीत ।)




तबीब  कसाई   हो   गए? (व्यंग गीत ।)



चेहरे    की   चमक,   तेरी  जेब   की  खनक,

सब   कुछ  देखो,  हवा  -  हवाई   हो   गए..!!

मुफ़्त   में   तबीब   ये  बदनाम   हो    गए  ?

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  

इलीस =  धर्म  मार्ग  से  भ्रष्ट, शैतान )


  अंतरा-१.


इन्सानियत   की   तो,   ऐसी   की   तैसी..!!

साँठ - गाँठ   है   ज़िंदा,   वैसे    की   वैसी..!!

नेता - बीमा - लेब,  सब  लुगाई   हो   गए..!!

जब  से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  




अंतरा-२.


कौन    अंग   दायाँ,  कौन   सा   है    बायाँ..!!

कौन    यहाँ     बच्चा,   कौन    यहाँ    बुढ़ा..!!

हाड़ - मांस    पिघल   के,  दवाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?  


अंतरा-३.



कहाँ    है    ग़रीबी,  कहाँ   के   तुम  ग़रीब..!!

गुर्दे की  क़िमत  सुन, खुल  जाएगा नसीब..!!

बदन  -  दवा   -  दारू,   महँगाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?   


(गुर्दा = कीडनी)



अंतरा-४.


कहाँ   के   ये   ईश्वर,  कहाँ   के   ये   गोड़..!!

ऐंठे  -  जीते  -  मरते,   है   सब   गठजोड़..!!

अस्पताल    सोने   की    खुदाई   हो  गए..!!

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?   


अंतरा-५.


तुलसी  -  हलदी  -  हरडे,  अनर्थ  हो   गए..!!

ग्रंथ    ये    पुराने,  सब    व्यर्थ    हो   गए..!!

माँ   के   सारे    नुस्खे    दंगाई   हो   गए..!!   


तब  से  तबीब, इलीस  कसाई  हो  गए ?

(दंगाई =  उपद्रवकारी)

मार्कण्ड दवे । दिनांक - २७ -११ - २०११. 

शनिवार, 26 नवंबर 2011

ख़ुदगरज लीडर । (व्यंग गीत ।)







ख़ुदगरज  लीडर । (व्यंग गीत ।)


ख़ुद    से   भी  ख़ुदगरज  होते  हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-१.


धन - दौलत  के  चंद  टूकड़ों   की  ख़ातिर,

हर   पल  ज़मीर   से   झगड़ते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-२.


जन्नत  हथिया  कर, ईमान  दफ़ना  कर, 

जन्नत को जहन्नुम,  बदलते   हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-३.


मर कर  जी  रहे  हम, जी लिया अब जी भर,

लहू     लोगों    का    खूब   पीते   हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा   समझते   हैं   चीटर ।



अंतरा-४.



रूहें   दबा   कर,  जिस्मों   को  कूचल  कर,

तिजारत,   लाशों    की    करते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा   समझते   हैं   चीटर ।

(तिजारत=व्यापार)


अंतरा-५.


ख़ुदा   को    ख़तावार, खुलेआम  कह  कर, 

ख़ुदा    से    भी   बदला   लेते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


ख़ुद    से   भी   ख़ुदगरज  होते  हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


मार्कण्ड दवे । दिनांक-२६-११-२०११.

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

जरा सोचिए...

Sahi hai bhai,
सही बात है भाई !!!!!

Aaj har gadhe ke paas mobile hota hai,
आज हर गधे के पास मोबाईल होता है,



par kya har mobile wala gadha hota hai?
पर क्या मोबाईल वाला गधा होता है?

Agar haan to sochye !!!!!!*अगर हाँ तो सोचिए,

waqt padne par gadhe ko bhi baap banana padta hai,
वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है,



kya  waqt aane par "baap ko bhi ........................"?
क्या वक्त आने पर बाप को भी  "........................................."?


एम.आर.अयंगर.09425279174.

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।





भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।


आज के हालात के अनुरूप, यथार्थ, भ्रष्टाचारी-व्यंगात्मक दोहे. .!!

(१)


* आदरणीय श्रीअण्णाजीके दल में घूसे हुए, तकसाधुओं को समर्पित...!!


अण्णा अण्णा सब जपे, देखत है सब ताल,

मौका जिसको जब मिले, एंठत है सब माल ।


(२)


* जेल के बजाय आज भी, जो नेता महलमें एश कर रहे हैं, उनको समर्पित..!!


भ्रष्टाचारी मत कहो, लेता कभी - कभार,

बकते हैं जो बकबकें, भरता उदर अपार ।


(३)


* भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन कर रहे, कार्यकर्ता पर, हिंसक हमला करनेवालों को समर्पित..!!


बजरंग तो बदल गए, कलयुग गयो समाय,

लंकादहन को भूल ये, अवध को ही जलाय ।


(४)


* पार्टी फंड एंठनेवाले, राष्ट्रिय पक्षों के शिर्षस्थ नेताओं को समर्पित..!!


उजला - काला सब किया, कछु न दरद मन जान,

परम-धरम तो नक़द है, घूसखोरी करम सुजान ।


(५)


* ग़रीब जनता का लहु पीनेवाले, सभी राजनेताओं को समर्पित..!!


धन - दौलत की लत लगी, पूजत है दिन रात,

नेता बेचारा क्या करें, बिनु मांगे मिल जात ।


(६)


* हरदम दंभी प्रामाणिकता का राग रटनेवाले, सभी लोगों को समर्पित..!!


धन को काला मान के, जनता बहुत पीड़ाय,

सुख तो नेता-घर बसे, बैठा अलख जगाय ।


(७)


* जेल में बैठ कर, बिना ड़रे, मौज उड़ा रहे, सभी भ्रष्टाचारीओं को समर्पित..!!


लक्ष्मी की नाराजगी, घर खाली कर जाय,

भ्रष्टाचारी ना डरे, सब कुछ अपहर जाय ।


(८)

चुनाव के वक़्त घर बैठ कर, वोटिंग न करनेवाले, सभी नागरिको कों समर्पित..!!


टेबल - टेबल घूम के, बांटो तुम परसाद,

बच्चें भूखों जब मरे, मत करना अवसाद ।

(अवसाद = विषाद)


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २१-१०-२०११.

--

शनिवार, 27 अगस्त 2011

पीएम ने कहा और अनशन टूट गया

पी एम भी हैं प्रसन्‍न
अन्‍ना भी हैं खुश
तोड़ने वाले हैं अनशन

पी एम ने बतलाया है
अभी अभी उनका संदेश
मेरे मोबाइल पर आया है

संदेश में लिखा है
कंप्‍यूटर प्रत्‍येक मर्ज की दवा है

टाइप करो CORRUPTION
कर्सर को वहीं मटकने दो
कंट्रोल प्‍लस ए दबाओ
फिर तुरंत डी दबाओ
कंट्रोल पर से
न ऊंगली हटाओ
देखना हुआ न चमत्‍कार
डिलीट हो गया
सारा भ्रष्‍ट्राचार

लेकिन इतनी जल्‍दी
मत खुश हो अन्‍ना
अभी रिसाइकिल में
जाकर बीन बजानी है
वहां से एम्‍पटी जगह
तुरंत खाली करानी है

उसके बाद न रहेगा भ्रष्‍टाचार
न मिलेगा करप्‍शन
चाहे करना सर्च
चाहे करना फाइंड
कितना ही लगाना माइंड

देखा मिट गया करप्‍शन
तोड़ दो अन्‍ना अपना अनशन

खाओ भरपेट राशन
अब मैं झाडूंगा भाषण
अगर नहीं आता कंप्‍यूटर चलाना
तो सीखकर आओ अन्‍ना, क्‍यों
इकट्ठा कर लिया है जमाना

जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ
यूं ही मत विश्‍वभर में कोहराम मचाओ
जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ

सारे विश्‍व का भ्रष्‍टाचार खुद अकेले मिटाओ
और सच कह रहा हं कि खूब ख्‍याति पाओ

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

आज कल 2nd हैण्ड जूता भी 200 में आता है .....अरशद अली

पुत्र ने पिता से पूछा,
पापा मुनाफा किसे कहते हैं?
पिता ने सरलता से कहा,
कोई बस्तु कम कीमत का हो
और अधिक मूल्य में बीक जाता है
तो जो अतिरिक्त धन प्राप्त होता है
वही मुनाफा है.

पुत्र ने कहा,
तब तो मुझे मुनाफा कमाना आ गया
असल में चौकीदार को आपका जूता भा गया
कल आप मम्मी पर जूते को लेकर
चिल्ला रहे थे
तुम्हारे बाप का दिया दहेजुआ जूता
एक कौड़ी का है बतला रहे थे...

मैंने उसी एक कौड़ी के जूते को
चौकीदार से 20 रूपया में बेच दिया हूँ
और एक कौड़ी के जूते पर
कई रूपया मुनाफा लिया हूँ

पिता ने कहा,
मुर्ख के बच्चे
वो जूता तो तुम्हारी माँ से
लड़ने का एक बहाना था..
उसे हीं बेच कर तुम्हे मुनाफा कमाना था?

जरुर तुम्हारी माँ ने ये सिखलाया होगा
तुम्हारे हाथ से उसी ने जूता बिकवाया होगा

पुत्र बोला,नहीं -नहीं
चौकीदार कुछ दिनों से नंगे पाँव
काम पर आ रहा था
कल देखा वो थोडा लंगड़ा रहा था
पूछने पर कहा ...
छोटे साहब जूता कहीं ग़ुम हो गया
2nd हैण्ड खरीदने के लिए भी पैसा कम हो गया
तभी मुझे आपके जूते बेचने का ख्याल आया
मेरे इस व्यवसाय को माँ ने नहीं सिखलाया

पिता ने कहा,
माँ के पक्षधर ,तुम्हारे इस व्यवसाय में
मुनाफा नहीं घाटा है
आज कल 2nd हैण्ड जूता भी 200 में आता है

सुनते हीं पुत्र ने पुनः एक प्रश्न दागा...
मुनाफा कैसे घाटा बन जाता है ?
और ये घाटा किसे कहा जाता है ?

पिता ने कहा,
इस प्रश्न का उत्तर ना हीं जानो तो अच्छा है
शादी से पहले तुम्हारी माँ मुनाफा,
शादी के बाद घाटा..
और इस घाटे का चक्रब्रिधि-ब्याज
तुम्हारे जैसा बच्चा है



शनिवार, 30 जुलाई 2011

नेता की औलाद और नाम है ..........


होली के दिन जनमा
एक नेता का बेटा,
मुसीबत बन गया
चैन से नहीं लेटा ?


पैदा होते ही
कमाल कर गया,
उठा, बैठा और
नेता की कुर्सी पर चढ़ गया !

यह देख डॉक्टर घबराई,
बोली – ये तो अजूबा है !
इसके सामने तो
साइंस भी झूठा है !!
इसे पकड़ो और लिटाओ
दुधमुंहा शिशु है, माँ का दूध पिलाओ ।

दूध की बात सुनकर
शिशु ने फुर्ती दिखाई,
पास खड़ी नर्स की
पकड़ी कलाई
बोला – आज तो होली है,
ये कब काम आएगी,
काजू-बादाम की भंग
अपने हाथों से पिलाएगी ।

नेता और डॉक्टर के
समझाने पर भी वह नहीं माना,
चींख-चींखकर अस्पताल सिर पर उठाया,
और गाने लगा ‘शीला’ का गाना !


उसके बचपने में
‘शीला की ज़वानी’ छा गई,
‘मुन्नी बदनाम न हो
इसलिए नर्स भंग की रिश्वत लेकर आ गई !

शिशु को भंग पीता देख
नेताजी घबराये और बोले -
‘तुम कौन हो और
क्यों कर रहे हो अत्याचार ?’
शिशु बोला – तुम्हारी ही औलाद हूँ
और नाम है भ्रष्टाचार

कवि : श्री राकेश "सोहम"

शनिवार, 9 जुलाई 2011

इतिहास की परीक्षा



इतिहास परीक्षा थी उस दिन, चिंता से हृदय धड़कता था |
थे बुरे शकुन घर से चलते ही, दाँया हाथ फड़कता था ||

मैंने सवाल जो याद किए, वे केवल आधे याद हुए
उनमें से भी कुछ स्कूल तकल, आते-आते बर्बाद हुए

तुम बीस मिनट हो लेट द्वार पर चपरासी ने बतलाया
मैं मेल-ट्रेन की तरह दौड़ता कमरे के भीतर आया

पर्चा हाथों में पकड़ लिया, ऑंखें मूंदीं टुक झूम गया
पढ़ते ही छाया अंधकार, चक्कर आया सिर घूम गया

उसमें आए थे वे सवाल जिनमें मैं गोल रहा करता
पूछे थे वे ही पाठ जिन्हें पढ़ डाँवाडोल रहा करता

यह सौ नंबर का पर्चा है, मुझको दो की भी आस नहीं
चाहे सारी दुनिय पलटे पर मैं हो सकता पास नहीं

ओ! प्रश्न-पत्र लिखने वाले, क्या मुँह लेकर उत्तर दें हम
तू लिख दे तेरी जो मर्ज़ी, ये पर्चा है या एटम-बम

तूने पूछे वे ही सवाल, जो-जो थे मैंने रटे नहीं
जिन हाथों ने ये प्रश्न लिखे, वे हाथ तुम्हारे कटे नहीं

फिर ऑंख मूंदकर बैठ गया, बोला भगवान दया कर दे
मेरे दिमाग़ में इन प्रश्नों के उत्तर ठूँस-ठूँस भर दे

मेरा भविष्य है ख़तरे में, मैं भूल रहा हूँ ऑंय-बाँय
तुम करते हो भगवान सदा, संकट में भक्तों की सहाय

जब ग्राह ने गज को पकड़ लिया तुमने ही उसे बचाया था
जब द्रुपद-सुता की लाज लुटी, तुमने ही चीर बढ़ाया था

द्रौपदी समझ करके मुझको, मेरा भी चीर बढ़ाओ तुम
मैं विष खाकर मर जाऊंगा, वर्ना जल्दी आ जाओ तुम

आकाश चीरकर अंबर से, आई गहरी आवाज़ एक
रे मूढ़ व्यर्थ क्यों रोता है, तू ऑंख खोलकर इधर देख

गीता कहती है कर्म करो, चिंता मत फल की किया करो
मन में आए जो बात उसी को, पर्चे पर लिख दिया करो

मेरे अंतर के पाट खुले, पर्चे पर क़लम चली चंचल
ज्यों किसी खेत की छाती पर, चलता हो हलवाहे का हल

मैंने लिक्खा पानीपत का दूसरा युध्द भर सावन में
जापान-जर्मनी बीच हुआ, अट्ठारह सौ सत्तावन में

लिख दिया महात्मा बुध्द महात्मा गांधी जी के चेले थे
गांधी जी के संग बचपन में ऑंख-मिचौली खेले थे

राणा प्रताप ने गौरी को, केवल दस बार हराया था
अकबर ने हिंद महासागर, अमरीका से मंगवाया था

महमूद गजनवी उठते ही, दो घंटे रोज नाचता था
औरंगजेब रंग में आकर औरों की जेब काटता था

इस तरह अनेकों भावों से, फूटे भीतर के फव्वारे
जो-जो सवाल थे याद नहीं, वे ही पर्चे पर लिख मारे

हो गया परीक्षक पागल सा, मेरी कॉपी को देख-देख
बोला- इन सारे छात्रों में, बस होनहार है यही एक

औरों के पर्चे फेंक दिए, मेरे सब उत्तर छाँट लिए |
जीरो नंबर देकर बाकी के सारे नंबर काट लिए  ||

-  Om Prakash Aditya



सोमवार, 4 जुलाई 2011

"अप्रेल फूल, अप्रेल फूल।"

एक दिन
घर पर हमारे
मच गया हंगामा
कहने लगी बच्चो की माँ-

"रखना याद

दस दिन बाद
यानी एक अप्रेल को
अपनी वर्षगांठ मनाऊँगी

मिठाई बाज़ार से आएगी

नमकीन घर में बनाऊँगी
और सुनो!

हमारे भैया को दे दो तार

वे चार दिन पहले आएँ
भाभी व अम्मा को साथ लाएँ
सुख-दुख में
अपने ही साथ न देंगे
तो घर गृहस्थी के काम कैसे चलेंगे

पप्पू की बुआ को

एक दिन पहले पत्र डालना
और लिखना-

"अकस्मात

कल रात
वर्षगांठ मनाने की बात
हो गई है
तुम न आ सकोगी
इस बात का दुख है

तुम्ही सोचो!

उनको बुलाकर भी क्या करोगे
इस दड़बे में
किस-किस को भरोगे
वे आएँगी
तो बच्चो को भी लाएँगी

और सुनो,


एडवांस की अर्ज़ी दे आना


लोगों का क्या है

कहते है-"दारू पीता है।
मगर लेडीज़ कपड़े तो गज़ब के सीता है
पचास बरस की बुढ़िया
दिखने लगती है गुड़िया

अब तक खूब बनी

आगे नहीं बनूंगी
साड़ी और ब्लउज़ नहीं पहनूंगी
युग बदल गया है
फैशन चल गया है

तंग सलवार हो

रंग व्हाईट हो
स्लीवलैस कुर्ता हो
नीचा और टाइट हो

चोटियो का रिवाज़ भी हो गया पुराना

आजकल है जूड़ो का ज़माना
बाज़ार में बिकते है
नक़ली भी असली दिखते है

एक तुम भी ले आना

तैयार ना मिले तो आर्डर दे आना
कपड़े बच्चो के लिए सिलेंगे
वर्ना पुराने कपड़ो में
अपने नहीं, पराए दिखेंगे।"

हम चुपचाप सुन रहे थे
चूल्हे में पड़े भुट्टो की तरह भुन रहे थे
तड़तड़ाकर बोले-

"क्या कहती हो

इक उम्र में हरकत
अज़ब करती हो
अरे, वर्षगांठ मनानी है
तो बच्चो की मनाओ
अपने आप का तमाशा न बनाओ

लोग मज़ाक उड़ाएंगे

तुम्हारा क्या बिगड़ेगा
मुझे चिढ़ाएंगे
मुझे ज्ञात है
सन छयालीस की बात है
तुम जन्मी थीं मार्च में
तुम्हारे बाप थे जेल में
और तुम वर्षगांठ मना रही हो अप्रेल में

फिर तंग कपड़ो में, उम्र

कच्ची नहीं हो जाती
नख़रे दिखाने से बुढ़िया
बच्ची नहीं हो जाती।"

वे बन्दूक से निकली गोली की तरह
छूटीं
वियतनाम पर
अमरीकी बम-सी फूटीं-

"तुम भी कोई आदमी हो

मेरा मज़ाक़ उड़ाते हो
अपनी ही औरत को
बुढ़िया बुलाते हो

अरे, औरो को देखो

शादी के बाद
डालकर हाथो में हाथ
मज़े से घूमती हैं
सड़को पर
बागों में
साइकल पर
तांगों में

मगर यहाँ

ऐसे भाग्य कहाँ
पड़ौस के गुप्ता जी के बच्चे हैं
मगर तुमसे अच्छे हैं

मज़ाल है जो कह दें

औरत से आधी बात
पलको पर बिठाये रहते हैं
दिन-रात

और एक तुम हो

जब देखो
मेरे मैके वालो की पगड़ी उछालते हो
सारी दुनिया में
तुम्हीं तो साख वाले हो
बड़ी नाक वाले हो
बाकी सब तो नकटे हैं

जब हमारे बाप जेल में थे

तो तुम वहीं थे न
जेलर तुम्ही थे न
नब्ज़ पहचानती हूँ
अच्छे, अच्छों की
खूब चुप रही, अब बताऊँगी
देखती हूँ कौन रोकता है

वर्षगांठ अप्रेल में

मनाऊँगी, मनाऊँगी
ज़रूर-ज़रूर मनाऊँगी।

हम तुरुप से कटे नहले की तरह
खड़े-खड़े कांप रहे थे
अपना पौरुष नाप रहे थे
अपनी शक्ती जान गए
वर्षगांठ मनाने की बात
चुपचाप मान गए

तार दे दिया पूना

सलहज, सास और साले
जान-पहचान वाले
लगा गए चूना

पांच सौ का माल उड़ा गए

हाथी चवन्नी का
दस पैसे का सुग्गा
अठन्नी का डमरू
पांच पैसे का फुग्गा
तोहफ़े में पकड़ा गए

उम्मीद थी अंगूठी की

अंगूठा दिखा गए
हमारी उनका पारा ही चढ़ा गए
बोलीं-

"भुक्खड़ हैं भुक्खड़

चने बेचते हैं
चने
ज़रा-सा मुंह छुआ
और दौड़ पड़े खाने
अरे, आदमी हो
तो एटीकेट जानें

अब हम भी उखड़ गए

आख़िर आदमी हैं
बिगड़ हए-

"कार्ड पप्पू ने छपवए थे

तुमने बंट्वाए थे।"

तभी मुन्ना हमारे हाथ का फ़ुग्गा ले गया

निमंत्रण-पत्र हाथों में दे गया

पढ़ते ही कार्ड

समझ में आ गई सारी बात

छपना चहिए था-"जन्म-दिवस है देवी का।"

मगर छप गया था-"बेबी का।"

दूसरे कमरे में

श्रीमती जी
पप्पू को पीट रहीं थीं
बेतहशा चीख़ रहीं थीं-
"स्कूल जाता है, स्कूल।"
बच्चे चिल्ला रहें थे-

"अप्रेल फूल, अप्रेल फूल।"

और चुन्नू डमरू बजाकर
मुन्नी को नचा रहा था

वर्षगांठ के लड्डू पचा रहा था।

लेखक : श्री शैल चतुर्वेदी साभार : कविता कोश

मंगलवार, 21 जून 2011

क्या हमारे बापू ने हमें यही सिखाया ?


हमारे देश का प्रजातंत्र
वह तंत्र है
जिसमें हर बिमारी स्वतंत्र है
दवा चलती रहे, बीमार चलता रहे-
यही मूल-मंत्र है।

फलवाले से कहा :
"ऊपर से देखने में चिकना है
भगवान जाने रस कितना है।"

तो बोला: "गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है

कर्म करो और फल मुझ पर छोड़ दो।
हम दोनों ने अपना-अपना कर्म किया
मैंने दिया और आपने लिया
अब फल अच्छा निकले या ख़राब
यह तो हरि-इच्छा है जनाब।"

डॉक्टर से कहा:"आँख है तो ज़िन्दगी है
एक गई दूसरी बची है।"

तो बोला:"लोग-बाग बिना बोर्ड पढ़े

चेम्बर में घुस आते हैं
शर्म नहीं आती
नाक वाले डॉक्टर को
आँख दिखाते हैं।"

दर्ज़ी से कहा:"कुर्ता पेट पर टाइट सिला है।"
तो बोला:"कपड़ा क्या आपको

प्रेज़ेंट में मिला है
पानी में डालते ही आधा रह गया
अब जैसा बना है ले जाइए
कुर्ते को पेट के लायक़ नहीं
पेट को कुर्ते के लायक़ बनाइए।"

पान वाले से कहा:"पाँच रुपये का पान

कहाँ जाएगा हिन्दुस्तान?"

तो बोला:"खा कर तो देखिए श्रीमान

आत्मा खिल जाएगी
हमारे पाँन की पीक
शहर के हर कोने में मिल जाएगी।"

किताब वाले से पूछा:"प्रेमचन्द का गोदान है?"
तो बोला: "गोदान!

यह नाम तो पहली बार सुना है श्रीमान
हम तो साहित्य का सम्मान कर रहे हैं!
सत्य कथाएं बेच कर
राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण कर रहे हैं।

कैलेंडर वाले से पूछा: "हरिवंश राय बच्चन का चित्र है?"
तो बोला: "आपका टेस्ट भी विचित्र है

वर्तमान को
भूतकाल के कन्धे पर टांग रहे हैं
बेटे के ज़माने में
बाप का चित्र मांग रहे हैं।"

लेखक से कहा: "यार कुछ ऐसा लिखो

कि भीड़ से अलग दिखो।"

तो बोला: "जैसा बनता है लिख रहे हैं

यही क्या कम है
कि हमारे जासूसी उपन्यास
रामायण से ज्यादा बिक रहे हैं।"

दुकानदार से कहा: "यार ठीक से तौलो"
तो बोला: "तौलने के बारे में कुछ मत बोलो

ज़िन्दगी भर यही किया है
ग्राहक को तौल से ज्यादा दिया है
आप पहले हैं जो बोल रहे हैं
वर्ना कोई नहीं देखता
कि हम क्या तौल रहे हैं।"

नौकरानी से कहा:"एक तो बर्तन चुराती हो

उपर से आँख दिखाती हो।"

तो बोली:दिखा तो आप रहे हैं

बर्तन मलवाओ, न मलवाओ
चोरी का इल्ज़ाम मत लगाओ
हमें पता है
कि आप कितने बड़े है
आधे बर्तनो पर तो
पड़ौसियों के नाम पड़े है।"

बेटे से कहा:"बाल मत बढ़ाओ"
तो बोला:"पापाजी, आदर्श का पाठ मत पढ़ाओ

हम ज़माने के साथ चल रहे हैं
आपके बाल नहीं है न
इसलिए आप जल रहें हैं।"

बीबी से कहा:"पति हूँ, चपरासी नहीं।"
तो बोली:"पत्नी हूँ, दासी नहीं

बाहर की भगवान जाने
घर में मेरी चलेगी
चिराग़ लेकर ढूंढने से भी
ऐसी बीबी नहीं मिलेगी।"

बेटी से कहा:"इतनी रात को कहाँ जा रहीं हो?"
तो बोली:"टोको मत जाने दो

आपसे तो दामाद फँसा नहीं
मुझे ही फँसाने दो।"

पड़ौसी से कहा:"आपका बेटा लड़कियों को छेड़ता है।"
तो बोला:"बेटे का नहीं उम्र का दोष है

जैसा भी है अच्छा है
किसी ऐसे वैसे का नहीं
हमारा बच्चा है।"

लड़के वाले से कहा:"बेटी पढ़ी-लिखी और सुन्दर है।"
तो बोला:"हमारा बेटा कौन-सा बन्दर है

रंग थोड़ा पक्का है
फिर पढाई में क्या रक्खा है
अच्छे-अच्छे लोग
डिगरियाँ लटकाए घूम रहे हैं
भाई साहब!
अपुन तो ऐसी लड़की ढूंढ रहे हैं
जिसके बाप के पास पैसा हो
चेहरे का क्या है
चाहे जैसा हो।"

प्रोफ़ेसर से कहा:"जब देखो

कॉफी हाउस में नज़र आते हो
बच्चों को कब पढ़ाते हो?"

तो बोला:"साल में दो महीने इतवार के

तीन स्ट्राइक के
चार त्योहार के
बच्चे अपने आप पास हो जाते हैं
नकल मार के।"

सिपाही से कहा:"कानून को भी मानते हो

या केवल डंडा घुमाना जानते हो?"

तो बोला:"कानून की भाषा पढ़े-लिखे बोलते हैं

हम तो हर कानून को
डंडे से तोलते हैं
डंडा हाथ में है तो गुंड़ा साथ में है।"

नेता से कहा:"वोट लिया है

बदले में क्या दिया है?"

तो बोला:"हम नेता हैं

आगे रहते है
पीछे क्या हो रहा है
कैसे देख सकते हैं
हमने माना कि देश का हाल बुरा है
मगर हमारे बापू ने हमें सिखाया है

बुरा मत देखो
बुरा मत सुनो
बुरा मत बोलो।"

लेखक : श्री शैल चतुर्वेदी

शनिवार, 18 जून 2011

राजनेता - एक परिभाषा अंतस से (^_^)


राजनेता , जैसे कि नाम से ही प्रतीत होता होता हैं |
 जन पे जबरन राज़ करने वाला राजनेता होता हैं ||



राजनेताओं की करतूतों पे एक बारगी ,
काला कौवा भी शरमा जायें |
लगा दे इनके इल्ज़ाम इस धरती पे, 
तो ये फट जाए , भूचाल आ जाए ||

साँप को पूछो नेता को देखकर
 भाग गए क्यूँ  आप | 
कहीं मुझे न काट ले रोकर बोले साँप  ||

जहर तो इनमें इतना भरा की 
टॉइलेट पे थूके तो 'हारपिक" से ज्यादा साफ़ होता हैं |
डाल दें किसी पे बुरी नज़र तो बंदा खड़े खड़े ही खाक होता है ||

राजनेता यारों ये गज़ब के होते हैं |
रात को कसम बाप की खाएं तो 
अगली सुबह तक पड़ोसी शमशान में होते हैं ||


एक बार एक राजनेता के घर का कुत्ता 
राजनीतिक माहौल से ऊब गया |
और निकला , घर से बाहर 
शहर के गंदे नाले मैं जाकर डूब गया ||
आसपास के कुत्तों ने उसे निकाला ,
और डूबने का कारण पूछा 
कुत्ता रोते हुए बोला ,
अब और ज़ुल्म हम सह नहीं सकते |
चाहे कुछ भी हो जाए 
एक घर में  दो कुत्ते अब रह नहीं सकते  ||


|| मनसा ||




शुक्रवार, 17 जून 2011

छींटे और बौछार



छींटे और बौछार


झुंझला के तुमने जैसे,

झिड़का था एक बार,

फिर एक बार वैसा ही अपना,

मुखड़ा सँवार लो.
...........................................

कैसे सुनाई दे मुझे,

जो जुबाँ तेरी कह रही,

शोरगुल जो कर रहे,

तेरे ये दो चंचल नयन.
............................

साल भर हम सो रहे थे,

एक दिन के वास्ते,

जागते ही ली जम्हाई,

और फिर हम सो गए.
.........................................

हम कर सकें बेहतर जिसे,

अंग्रेज क्यों करने लगे,

आजादी अपने देश को वे,

दे गए क्या इसलिए  ???
……………………………………..

इंद्र धनुष के रंग क्यों गिनो,

यह दुनिया बहुरंगी है,

आलीशान मकानें में भी,

दिल की गलियाँ तंगी हैं,

मन:स्थिति कैसे भी बाँच लो,

वस्तुस्थिति तो नंगी है,

भले जुबानी हिदी बोले,

करें सवाल फिरंगी हैं,

भीड़ भरी है हाईवे पर अब,

और खाली पगडंडी हैं,

शहरों का अंधी गलियों में,

धन दौलत की मंडी है.
...........................................

एम.आर.अयंगर.
0997996560.